Saturday, June 22, 2013

पहाड़ की डायरी-2

पहाड़ की डायरी-2
 
मैंने पहले बताया था खाने की अव्यवस्थाओं को लेकर कितनी खींचातानी हुई थी । अब आगे……

 रेस्ट हाउस के रसोइयों ने इस बात का भी जिक्र किया कि वे वहां से करीब 8-10 km दूर रहतें हैं, और हफ्ते में सिर्फ एक ही दिन अपने घर जा पाते हैं। हफ्ते भर का राशन वो अपनी साइकिल में बांध के ले आते हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि उनकी तनख्वाह भी रेगुलर नहीं थी, दिहाड़ी में काम करते थे वो। मेरा गुस्सा काफूर हो गया, यह जानकर कि जो खुद दो जून की रोटी सही से नहीं खा रहे, वो भला हमें क्या खिला पायेंगे। अलबत्ता, जितना मिला, उतने में ही खुश हो लिए ... हम फ़िक्र में धुआं उड़ाते चल दिये.

बिनसर से कौसानी के लिए निकले। बड़े होने के बाद कौसानी जाने का बड़ा मन करता था, हाँ! बताती हूँ क्यों? बचपन से ये कहानी-किस्सागो लगता था। मेरी मम्मी बहुत कम उम्र (करीब 25 साल की)  में ही कौसानी बॉयज स्कूल की वाईस-प्रिंसिपल बन गयी थी। बहुत कठिनाई से अपने जीवन की शुरुआत की थी उन्होंने, स्वयं के अलावा परिवार के भरणपोषण का एक बड़ा जिम्मा उठाने लगी थीं वो। वो बताती हैं कि वहां के प्रिंसिपल साहब ने उन्हें कार्यभार सुपुर्द करते समय बड़े पापड़ बेलवाये थे। बहरहाल, बिनसर से कौसानी करीब 65 km है और हम लोग वहां शाम को पहुंचे। हम वहां एक तथाकथित बड़े  से होटल में रुके। यहाँ यह जरूर बता दूं कि करीब 50-60 कमरों वाले इस होटल में एक दक्षिण भारतीय कुनबे के अलावा एक परिंदा भी पर नहीं मार रहा था। चलो, एक हम भी पहुँच गए। एक से भले दो। कहीं ये जरूर कहूँगी कि ऊँची दुकान, फीके पकवान। आज मुझे ये बात पढ़ के अजीब लगती है कि केदारनाथ के पीड़ितों को पांच सौ रुपये में एक कटोरी चावला (भात), दो सौ में बिस्कुट  दे रहे हैं। हमने भी कमोबेश ऐसा ही देखा, खाने की गुणवत्ता के हिसाब से कीमतें आकाश छू रहीं थीं, पर मरता क्या न करता, जो मिला वो खा लिया। वहां की व्यवस्थाएं देख कर वहां रुकने का ज्यादा मन नहीं किया, सो उठाया बोरा-बिस्तर और चल दिए, अपनी भूमि अल्मोडा की ओर। अल्मोड़ा और कौसानी के बीच करीब 45 km का लम्बा सफ़र था। इस बार हमने मन बना लिया था कि वहां के लोगों के बीच बैठे सफ़र का आनंद उठाएंगे, सो एक सूमो में बैठ लिए।
पैसा कमाने के चक्कर में उस गाड़ीवाले ने अपने अन्दर के इंसान को जिन्दा रखा था। जितनी सीटें थीं, उतने ही यात्री , कुछ भी फालतू नहीं। गाड़ी के अन्दर जानवरों की तरह उसने यात्रियों को भर नहीं रखा था।  उसकी बातें सुन के लग रहा था, कि उसकी एक और गाड़ी थी, जिसे ड्राईवर चुरा के ले गया था और वह खुद उस गाड़ी का मालिक था। परेशान लग रहा था वह। गाड़ी चलने ही वाली थी और एक पंडित जी ने नयी यात्रा शुरू करने से पहले उन्होंने गाड़ी के सभी यात्रियों को पिठिया ( रोली) से भरी थाली दी, और सबने पिठिया लगा लिया। कोई लालच नहीं, कोई लोभ नहीं। ड्राईवर ने पूजा की थाली में 10 रुपये रखे और यात्रा शुरु। वैसे आज के ज़माने में दस रुपये में क्या होता है. इसे कहतें हैं, संतोषं परमं सुखं। न कोई मोल-मोलाई न उनसे श्रापे जाने का कोई भय, बस लाल और पीले चंदन चंदन से सजे अपने सुन्दर माथे को लेकर हम आगे के लिए निकल पड़े। हम बीच की सीट पर बैठे थे, और आगे ड्राईवर के अलावा 2  लोग थे, साथ में उनके थी एक नन्हीं-सी, प्यारी-सी बच्ची। मम्मी की गोद में चिपकी वो बच्ची पलट- पलट के पीछे देखे जा रही थी और कह रही थी बच्चे बैठें हैं पीछे। हमारी नानी थी वो... उसकी मम्मी ने ड्राईवर को बताया कि वो बीमार है और एक दिन पहले उसके चाचा ने अल्मोड़ा के डॉ गोसाई से मिलने का समय ले  रखा था। ऐसे तो वह देखने में ठीक ही लग रही थी पर विचारणीय बात यह थी कि हलके बुखार से पीड़ित उस बच्ची को देखने के लिए कौसानी में एक अच्छा डॉक्टर भी नहीं था। मालूम करने पर पता चला कि वहां के लोगों को हर बीमारी के इलाज़ के लिए अल्मोड़ा ही दौड़ना पड़ता है। कौसानी में इलाज़ के क्या साधन हैं, दवा-दारु की क्या व्यवस्था है, इसका अंदाज़ा लगाना मेरे लिए बड़ा ही कठिन था। दवा का तो पता  नहीं, पर दारु की अच्छी व्यवस्था का अंदाज़ा लगाया जा सकता था क्योंकि कौसानी टैक्सी स्टैंड में शाम को 5 बजे ही बेवडों की पलटन अच्छी खासी महसूस होने लगी थी …

हमारे बाबू (दादा जी) पहाड़ पर एक व्यंग हमेशा कहा करते थे,
 सदा शिकारम, भोजना दगाडम, बेय ब्याल पड गयीं, गदुआ का झाडम।

यह बात बड़ी कचोटने वाली यह थी कि दिल्ली में बैठ कर हम लोग, आज अपने आस-पास एम्स, फोर्टिस, मैक्स और अनगिनत हॉस्पिटल पाकर भी नुक्ताचीनी करते रहते हैं, पता नहीं वहां के लोग अपने इलाज के लिए किस भगवान का नाम लेते होंगे, किस देव की शरण में जाते होंगे ...

Friday, June 21, 2013

पहाड़ की डायरी

पहाड़ की डायरी

यूँ तो मन नहीं कर रहा है, बहुत ही विचलित कर देने वाली प्राकृतिक विपदा से मन कुम्हला गया है, दुःख से द्रवित है, पर अपनी मिटटी से जुड़े होने के कारण अपने विचार व्यक्त करना छोड़ भी नहीं सकती। आज से करीब एक महीने पूर्व ही मैं पहाड़ों (डानों) के दर्शन करके आई, पर ऐसा कुछ खास उमंग भरा कुछ भी नहीं रहा, कुछ स्थितियों के लिए तो हम खुद ही जिम्मेदार थे, और कुछ वहां की सामजिक, भॊगोलिक व्यवस्था देख के ह्रदय विदीर्ण-सा हुआ जा रहा था।

अल्मोड़ा से तो मेरा वैसा ही लगाव है, जैसा कृष्ण का वृन्दावन से. यह बहुत ही स्वाभाविक-सी बात थी, कि वहां तो मेरा जाना जरूर ही होता . पर कहानी शुरू होती है हल्द्वानी से, जहाँ से पहाड़ों की गुफाएं खुलती हैं। हल्द्वानी से बिनसर जाने का हमारा इरादा था और वन विभाग के एक गेस्ट हाउस में बुकिंग हो रखी थी। हल्द्वानी से अल्मोड़ा होते हुए हम बिनसर के लिये निकले थे। बेहद उत्साहित और अपनी धरती को छू लेने से ही अपने पहाडी होने का अहसास अविरल हिलोरे मार रहा था, कहीं भीतर। बिनसर में रेस्ट हाउस 0 पॉइंट में था, मतलब कि वहां 'न कोई बंदा, न बन्दे की जात'. देवदारों के सघन जंगलों से जाती हमारी गाड़ी और पृथ्वी से घर्षण करते गाड़ी से टायरों की आवाज़ से ही हमारा खून सूखे जा रहा था। भरे दिन के वक़्त रास्ते में अपनी साँसों की रफ़्तार और जंगलों से आती कीड़े-मकोड़ों की खुसफुसाहट मुझे क्या सोचने को मजबूर कर रही थी कि मैं आपको बता भी नहीं सकती। बिनसर से करीब 15  KM आगे जाकर ये रेस्ट हाउस था। वहां पहुँचने से  पहले नीचे ही हमसे कई प्रकार के टैक्स वसूल कर लिए गए। उस ऑफिस को देख कर ऐसा लगा कि सच में खज़ाना हाथ लग गया, और अब यहाँ खूब मजे करके जायेंगे। करीब दिन में 12 बजे हम वहां पहुंचे। गेस्ट हाउस काफी बड़ा था और हम लोग 5 लोग थे। 3  बड़े और 2 बच्चे। सबसे खूबसूरत और हैरान करने की बात यह थी की पूरा रेस्ट हाउस हमारे लिए बुक किया गया था। बिनसर जाते हुए कसारदेवी के पास हम चाय पीने के लिए रुके थे। चाय तो नहीं पी, पर कोल्ड ड्रिंक जरूर पी ली वहां एक नया विक्रय तरीका देख मुस्की काटे बिना नहीं रहा गया। कोल्ड ड्रिंक की नार्मल बोतल 10 रुपये की थी और बिक रही थी 12 में, जानते हैं क्यों? 2 रूपया फ्रिज में रखकर ठंडा करने के लिए। वहां के दुकानदार ने पूछा हमारे गंतव्य के बारे में, तो उन्होंने हिदयातन हमसे यह जरूर कह दिया कि अपने साथ खाने-पीने की सामग्री जरूर ले लेना, कुछ मैगी, ओट, और हलके-फुल्के खाने पीने की चीज़ें तो हम दिल्ली से ही ले के चले थे, पर फिर भी एहतियातन हमने ब्रेड, बटर, आलू, दूध  चाय पत्ती जैसी मौलिक चीज़ें अपने साथ ले लीं।
बिनसर गेस्ट हाउस पहुंचे और वहां की प्राकृतिक छटा देख के मन गदगद हो उठा। वहां के स्टाफ ने बड़े ही गर्मजोशी से हमारा स्वागत किया और हमारा सामान कमरों में रखवा दिया। कई घंटो के सफ़र से थका हम सबका शरीर चाय का प्यासा था। वहां के स्टाफ कम खानसामे को हमने चाय का आर्डर दिया, गरम चाय माँगने के सबब में एक ठंडा-सा  उत्तर मिला, साहब! यहाँ तो सामान नहीं होता, आपको खुद ही लाना पड़ेगा। भारत सरकार के एक बेहद खूबसूरत से अतिथि-गृह में स्वागत की इस भव्यता से हम इतने आहत हो गए कि मन किया काश! पहाड़ों से  नीचे कूद पड़ने पर गर कुछ न होता तो सीधे वसंत कुंज में आ टपकती। करेला, ऊपर से नीम चढ़ा ....... उसी गेस्ट हाउस में पीछे की तरफ बैठे थे एक बुजुर्ग दंपत्ति। जो कहीं नीचे प्राइवेट रेस्ट हाउस में रह रहे थे और उन्होंने ऊपर सामान ला कर गेस्ट हाउस की रसोई में खाने का आर्डर दे रखा था। भगवान की कृपा और उस भलमानस दुकानदार की सूझ-बूझ थी की हमने दूध, चीनी, और चाय पत्ती उसी की दुकान से खरीद ली थी। हमने उन्हें चाय बनाने का आर्डर दिया और साथ ही खाने के बारे में भी एक काल्पनिक मेनू पूछना चाहा। उन्होंने बताया कि यहाँ 0 पॉइंट में यात्रियों को रहने के लिए इस रैनबसेरे के अलावा और कुछ नहीं मिलता। न खाना, न चाय और न ही कुछ। उसने हमें सलाह दी कि 15 km पहले जो जगह है वहां से  1-2 दिन का रसद लाया जा सकता है। पर हमने हल्द्वानी से बुक की हुई गाड़ी वापस लौटा दी थी। तो अब करें भी तो क्या करें? हमने अपने बैग से खाने की जितनी भी सामग्री थी, बाहर निकाली और उन्हें बनाने के लिए दे दी। मैगी बनी, चाय बनी, ब्रेड गरम हुए और हमने प्याज़ टमाटर और नमकीन के साथ मिला कर उस सुस्वादु भोजन का आनंद लिया।

अब मेरे मन में सवाल उठता है कि कई हज़ार रुपये खर्च करने के बाद क्या हम ऐसे आतिथ्य के भागी थे। जब बुकिंग की गयी थी, तब ही साफ़-साफ़ शब्दों में क्यों नहीं बतलाया गया कि  खाने का कोई प्रबंध नहीं होगा, अपने जिन्दा रहने की सामग्री स्वयं ले के आयें।  हमारी भारतीय संस्कृति तो कहती है 'अतिथि देवो भव', और कलयुग में आज भी पतन के गर्तों में समाये हम मानव अपने अतिथियों से उनके जीने के सामान के आकांक्षी नहीं होते।
ऐसे समय में यही कहावत याद आती है,

रूखा-सूखा खाय के ठंडा पानी पी,
देख परायी चूपड़ी, मत ललचायें जी .....

जी के ललचने का तो सवाल ही नहीं होता पर रुखा-सूखा भी हाथ नहीं लगा। सरकारी सुविधाएं नाम की ही होती हैं, जब मौसम खुशगवार था, तब सरकारी रवैय्या कितना बेपरवाह था, आज वहां लोगों का क्या हाल होगा ये सोच के ही शब्द मौन हो गयें हैं।

शेष आगे .....       

Sunday, March 17, 2013

holi.....

किन्ने गुलाल मोहे मारी, भिगोई मेरी साडी,
खड़ी हूँ मैं तो ब्रज की नारी
मारो गुलाल पिचकारी, सर ररर सारी कि आये मेरे अवध बिहारी
 
हाथ में अबीर लिए राधा जी बुलाये,
पास में कन्हय्या देखो अभी नहीं जायें,
देखे ये नगरी खड़ी सारी,
भर के पिचकारी,
माधव मेरे खड़े इतराए .....

चुपके-चुपके कान्हा इत-उत जाएँ,
खड़े ओटन पर मंद मुस्काएं,
मारी गुलेल चुप आरी,
मटकी फोड़ी हाँ री,
फिरूं जी मैं तो हारी  हारी  ....

भरे हुए थाल में, रंगों  को सजाकर,
निकली जो राधिका, देखे करुणाकर
मुरली बजाएं अति न्यारी,
बुलाएं वो अपनी दुलारी,
छिडके रंग वो तो सारे,
सर, रर ररर हाँ रे
ओं होली में खेले हमरे दुलारे ........     

Thursday, March 7, 2013

विरह

विरह

वो था मधुमास,
जीवन में था केवल हास,
और तुम एक भ्रमर थे
उन्मुक्त उड़के तुम कभी चले आते थे
अन्यथा अपने छत्ते में ही पड़े रहते थे तुम तो

ये पता था मुझको कि
तुम्हारा एक ही ठिकाना
चाहा था कभी मैंने भी
जीवन तुम संग बिताना
क्योंकि ये पता तुमको तो था
कि कब खिलूंगी और कब मुरझाऊंगी में जीवन में कब
पर मैंने चुना तुमसे कहीं दूर जा,
खुद को बसाना।

प्रेम की हर पात मैंने नोच डाली,
छोड़ कर गिर गयी उस पौध से,
जिसके तुम थे माली,
अब भी अकस्मात् याद आते हो तुम
परागों में यदा और कभी भरेपूरे उपवन देख कर
संतुष्ट होती हूँ मैं कोसों दूर हूँ अपने नयन भर

ये नहीं तुमको बता सकती
कि मैंने विरह को क्यों चुना
आग में तपकर, भसम कर
अपना मन मैंने क्यों भुना ?
चाहते हो जानो कि, मेरे उस
संकल्प का क्या था प्रयोजन
हर घडी जो साथ थी मैं तो क्यों वियोजन?

प्रेम से वशीभूत होकर
सब हैं जुड़ते,
एक दूजे के साथ रहते, साथ चलते
हाथ में डाले हाथ, कुछ कहते, कह्कहाते,
पर अगर मैंने विरह को चुन लिया,
तो ओ मेरे प्रिय, मैंने कुछ नया नहीं किया,
स्वर्ण गर आग में तप जाए
तो निखर जाता है बंधु,
लौ में जल कर हर पतंगा
प्यार पता है अद्भुत
प्रीत के बदले मैंने
विरह को वर लिया 
प्रेम तुमसे प्रतिपल
मैंने उतना किया,
जैसे एक चकोर देखे चाँद को,
रोशनी बसती रहे हमारी आँख में,
ऐसी एक प्रीत मैंने भी तुमसे करी,
साथ चलने की न जिसमे कोई शर्त रखी ....         


  

Wednesday, March 6, 2013

भाभी

भाभी

हाँ तुम वही हो
जिसके ख्वाब मैं देखती थी,
तुम्हारे आने के सबब से
कुछ पल मैं मचलती थी।

बचपन में सोचा करती थी,
कि तुम कैसी होगी सुन्दर या मद्धम,
कोमल या, मलखंम-सी,
पर उस रोज जब देखा तुम्हें,
लगा यूँ जैसे तुम कहीं वही तो नहीं।

थोड़ी पगली, थोड़ी नादान,
अपने में ही डूबी ऐसी इंसान,
कुछ-कुछ मेरी सी,
कुछ बोझिल, थोड़ी मनचली
पर ऐ लड़की तुम हो भली।

प्यार तुमसे मैंने बहुत पाया,
औ' अपना सार प्यार लुटाया,
सोचा ना था, कोई इतनी तवज्जो देगा,
हर दिन मुझको याद करेगा,
हाँ तुम हो, तुम्हीं हो वो कदरदान,
जो सचमुच मेरा है, सिर्फ मेरा कहने लायक,
भाभी,  तुम हो मेरे सपनों सी निकली,
एक रोचक, अनबुझ-सी पहेली,
भय्या के साथ जुड़े तो भाभी,
अन्यथा मेरी एक साथी-एक सहेली,
एक प्यार भरा रिश्ता मेरा,
हर दम जुडा रहे तुमसे यूँ ही ...

Sunday, March 3, 2013

प्रतिमान

प्रतिमान 

इस बियाबान में आधे-अधूरे सपनों सपनों के बीच,
झुरमुटों के झरोखों से तुम्हें देखती हूँ मैं,
और फिर चुपचाप औंधे मुंह पलट जाती हूँ
जैसे कभी तुम्हें देखा ही न हो।

लम्बे घने दरख्तों की छाँव में,
बाल फैलाये बैठ जाती हूँ, जाड़े के दिनों में
कि मैं भी किसी को अपनी घनी छाँव में आसरा दे सकूँ,
पर एक घोंसला भी नहीं बनाता कोई
ना ही उड़के क्षण भर को कोई ठहरता है
जैसे मेरी इस अलसायी सुनहरी भूरी पत्तियों से
किसी को सुवास आती ही न हो।

सूखे पुराने पत्तों के बीच जो रास्ता सजा है
वहां से आती घर्र-घर्र की आवाज़
छुनमुन घुंघुरुओं का आभास देती है,
लरजती शाख से गिरती ओंस की बूँदें
रुनझुन पायलों का प्रतिमान देती हैं
कोई नहीं है सुनने वाला इसे
न ही कोई पथिक, न ही कोई प्रेमी
न ही गुजरता है कोई पाखी वहां से
ये सुरमयी सुरों की श्रुतियाँ
मैं ही चुपचाप सुनकर दिन प्रतिदिन भूल जाती हूँ।

घनघोर वटवृक्षों सी खड़ी समय की ये लम्बी चादर,
ढांप देती है पुराने हर नए मेरे ये किस्से प्रतिदिन,
उघाडूं कब कहाँ किसके समक्ष ये मेरे हिस्से नये दिन
कोई नहीं है दूर तक आता, न ही जाता परस्पर
भरी उन्माद में बैठी हूँ मैं एक आस लिए भर
कि आये कोई एक दिन, एक नयी पहचान लेकर
ताकूँ अल-सुबह रस्ते से मैं बैठूं फिर रूप नया धर,
बेवजह हंस दूं, या कुछ भी गुनगुना दूं
मृगमयी सी बन झूमती फिरूं इस सघन वन में
पदचाप सुन मैं ठिटक बुत बन जाऊं जैसे
कि आया दूर चंद्रमा और मैं हूँ चकोर ऐसे
पर रात की काली स्याह सी ये लम्बी पगडंडी
डरा देती है हर दूर से आते हुए पथिक को

बियाबान यह घना जंगल है जीवन
जहाँ आता है हर कोई किसी के पास
 एक ख़ास ही प्रयोजन
न जाता है ये जंगल आदमी की भीड़ के बीच
न ही इसे महसूस होती है कोई सुगबुगाहट
खड़ा जंगल सा है ये घनघोर जीवन
जहाँ सब के अपने रास्ते है और कई गलियां-चोबारें
मतलब जहाँ से पड़े निकल जाता है रस्ता
हर मुसाफिर एक दीपक हाथ में रख चल-निकलता
पथभ्रमित नहीं होता है कोई भी एक यात्री
जीवन जी लेता है अकेले या कभी कोई एक साथी
पर हर दिन मेरे एक उच्छ्वास आ निकलती
इन झुरमुटों के बीच मुझे एक आस लगती
कि आये एक साथी, कोई प्रिय या सखा एक
अफ़सोस मैं स्वयं पथिक बन यहाँ अविराम चलती
जंगलों का अपनी यही गुमनाम जीवन
न दुःख में दुखी न सुख में सुखी
बस बढ़ निरंतन ...........     

  


  
 



 

Tuesday, February 5, 2013

बेसूरमा हो गयी थी वो .....


कहानी, किस्सागो सुनाने की मैं इतनी अभ्यस्त नहीं, फिर भी एक कहानी सुनाने का मन कर रहा है। 


बेसूरमा हो गयी थी वो .....


कई साल पहले सूरमा ने बोर्ड की परीक्षा दी थी और परिणाम का इंतज़ार कर रही थी। उसे पता था कि वो पास भी हो जाएगी और अच्छे अंकों से, पर थोड़ी डरी हुई भी थी कि पता नहीं स्थिर का क्या हाल होगा। छोटी-सी उम्र में उसे अपने से ज्यादा उसका ख्याल था। दोनों ही बड़े नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ते थे। सूरमा को अपना तो पता था, पर स्थिर की पढाई की हालत की कोई खबर नहीं। ये जरूर देखा था, कि वो अपने दोस्तों के साथ नोट्स की अदला-बदली करता रहता था। उसके कई दोस्त आते थे, कभी कोई तो कभी कोई किसी न नाम उसने मेढक रखा तो किसी का नाम मुस्कान। सब कभी आँगन में बैठ जाते तो कभी छत पर चुहलबाज़ियाँ करते। सूरमा को ये सब अच्छा लगता था, कहीं लड़कपन में उसे अपने बढ़ने का बोध होता था। शीशे के सामने बालों के साथ खेलना उसे बेहद पसंद था। वो भी अपने आँगन में चारपाई लगा के बैठ जाती और केक्टस के गुलाबी फूलों से खिलवाड़ करती। कभी मिटटी को खोदती तो कभी पानी डालने के बहाने ही बाहर जाकर जूतों के निशान ताकती रहती। रिजल्ट के दिन नजदीक थे और उसकी उमंगों के भी। उसे एक अकल्पनीय राह की तलाश थी जिसके सपने वो सालों से देखती आ रही थी। आख़िरकार वो दिन भी आ गया जिसका उन सबको इंतज़ार था रिजल्ट आ गया और 'सूरमा और स्थिर' अच्छे अंकों से पास हो गए। सूरमा चाहती थी कि स्थिर को मुबारकबाद दे पर इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाई , इसलिए उसने गेट के सामने ही केक्टस के फूल दाल दिए।
नए स्कूल में दाखिले की मारामारी शुरू हो गयी। सूरमा का दाखिला आख़िरकार शहर से दूर एक वीरान-सी जगह में हो गया। बहुत खुश हो गयी सूरमा कि नए दोस्तों का साथ मिलेगा और नयी बातें होंगी। दोस्त बनाने में वो काफी पीछे थी पर दिल के किसी कोने में कहीं उसने किसी को एक ख़ास दोस्त का दर्ज़ा दे रखा था। ये बात अलग थी की कभी उससे कोई खास बात नहीं की थी, पर सोचती जरूर थी कि कभी वो भी उसी स्कूल में आएगा। एडमिशन के सारे कलाप पूरे हो चुके थे और नए सफ़र की ओर बढ़ने की बारी थी, उसे लगा की स्थिर साथ चलेगा पर उसने तो बिना बताये ही अपनी एक नयी राह चुन ली। बहुत दिल टूटा सूरमा का, लगा कि साथ चलने के सारे सपने टूट गए, मिटटी में मिल गए, बिखर गयी वो। अभी तो दिल कांच का ही था, थोडा-सा क्रैक आ गया उस पर। उन टूटे कांचों में भी 'हीर' सी बनी वो नादान अपना ही अक्स देख रही थी, उसे क्या खबर थी की इसका मतलब क्या निकलेगा। अभी तो बातों का, या यूँ कहें की नज़रों से रूबरू होने का सिलसिला शुरू भी नहीं हुआ था कि राह ही अलग हो गयी। अब बेमन से ही स्कूल जाने लगी थी सूरमा, कुछ ख़ास मन नहीं लग रहा था उसका वहां क्योंकि जिसके साथ कदम-दर-कदम जाने की सोची थी, वो तो पीठ पीछे न जाने किसी और ही रास्ते जा चुका था, नहीं दिखने के लिए। अचानक एक दिन उसने एक ख़त भेजा अपने घर पर, जहाँ उसने अपनी कुशलवाद भेजी थी और अपने नए कार्यकलापों का वर्णन किया था, उसना बताया कि वो जब आएगा तो 'खलनायक' बन के धूम मचा देगा। थोड़ी तस्सली हुई उसे क्योंकि उसने सभी का हाल पूछा था कहीं चिट्ठी के किसी कोने में उसका भी, उसे लगा कि वो भी कहीं एक्नोलेज हुई है।
एक दिन केमिस्ट्री की क्लास कर वो बाहर ही निकल ही रही थी, कि ये साहब अपने दोस्तों के साथ टोली बना के घूमते दिखे। आज तो लगा कि जैसे बगीचे के सारे फूल खिल गयें हैं और उसके चेहरे पर भी एक प्यारी-सी मुस्कान आ गयी है। अब सूरमा को हर रोज स्कूल जाना अच्छा लग रहा था और अब तो अपनी प्यारी-सी छोटी चोटी में वो लेस भी बांधने लग गयी थी, जिससे लेस की चमक सीधे उसके चेहरे पर पड़े और और उसका चेहरा भी चमकने लगे। पता नहीं कब दिन गुजर गए और स्थिर भी रफूचक्कर हो गया। चेहरा सुजा के सूरमा स्कूल बस में बैठी और और अनमने ढंग से क्लास में घुस गयी, उसने कभी किसी को इन अधूरी चाहतों का किस्सा नहीं बताया न ही शेयर किया। लगा कि जब कहानी बन जाएगी तो फ़साना सुनाई देगा। अब सूरमा लिखने लगी थी, तारों से बातें करने लगी थी, पन्नों को अपनी दास्ताँ सुना के खुद को तसल्ली दे देती। डूब गयी थी किसी कोने में वो उस मीठे अहसास की डुबकियां लगा के।

दशहरे के मेले में कई दोस्त फिर से जुट गए और सूरमा भी सब के साथ हो ली। अचानक स्थिर ने एक अनाउंसमेंट करवा दी की एकं लड़की इस भीड़ में खो गयी है, जिसका नाम सूरमा है ,जिसने सफ़ेद रंग की स्कर्ट और लाल रंग का टॉप पहना हुआ है, जिसे इसके बारे में पता चले तो कृपया बॉक्स में आकर सूचित कर दे। सूरमा को ख्याल आया कि उसने ही तो वो ड्रेस पहनी है, गुस्सा होने के बदले वो तो ख़ुशी के मारे झूमने लगी कि चलो आखिरकार उसके होने का अहसास तो है उसे। किसी भी तरह वो अपने वजूद का एहसास दिलाने के लिए बेताब थी। पढाई का तो पता नहीं, पर यौवन के सालों में सूरमा को लगने लगा कि वो बदरंग होने लगी थी, उसका चेहरा मुरझाया रहता था, उसके दोस्त भी पूछते थे कि वो क्यों चुप-सी मुरझाई, सकुचाई रहती है, पर उसके पास कोई जवाब नहीं थे, लोगों के सवालों के। कभी खुश हो जाती दोस्तों के किसी हंसी-ठठाकों के बीच अन्यथा लाजवंती की तरह सर झुकाए रहती।

साल ख़तम होने को था और सूरमा का संयम उसका मौन चरम पर था। उसने सोच लिया था इस बार वह स्थिर को बता के रहेगी कि वो उसे बचपन से ही बेहद पसंद करती है। जाड़े की छुट्टियां शुरू होने ही वाली थी और स्थिर भी घर आने वाला था। सूरमा का प्रोग्राम सारा सेट था इस बार पीछे नहीं हटने वाली वाली थी वो। नए साल के पिकनिक के लिए दोनों दोस्तों से साथ बाहर घूमने के लिए गए और कॉफ़ी-शॉप में कॉफ़ी आर्डर की थी, अचानक एक लड़की वहां आकर सबके बीच बैठ गयी, उसका नाम था शीतल। बेहद ही बिंदास, हंसमुख पर सूरमा की अपेक्षा कमतर सुन्दर और सभ्य। स्कूल के किस्से, बचपन की नादानियों के मांझे कभी कोई उडाता तो कभी कोई और काट डालता। शाम हो गयी और सभी बछड़ों की तरह अपनी माँ के आँचल में वापस जाने की तैयारी करने लगे। सूरमा और स्थिर को तो साथ ही आना था क्योंकि दोनों पास ही रहते थे और सूरमा को स्थिर के नाम पर ही बाहर जाने की इजाजत मिली थी। घर थोड़ी-ही दूरी पर था, और स्थिर ने सूरमा का हाथ थाम लिया और बड़े ही भरोसे के साथ एक बात कहने की हिम्मत जुटाई। सहमी, घबरायी और बेबस सूरमा ने बस अपनी सांसें संभाल रखी थी, उस ख़ास बात को सुनने के लिए। स्थिर ने कहा वो शीतल है, मैं उसे बहुत पसंद करता हूँ और उसी के साथ स्कूल में पढता हूँ। फक्क पढ गया चेहरा सूरमा का, उसकी आँखों में बसा स्थिर का चेहरा स्थिर ने पढ़ गया और सुन्न हो गया वो भी। बेसूरमा हो गयी वो और भाग के घर में घुस गयी सूरमा और पापा के सीने में चिपटकर फफकने लगी, ' पापा, मैं हार गयी, हार गयी, मेरा नाम ही गलत साबित हो गया, मेरी आँखों से ही कोई और सूरमा चुरा ले गया और कुछ न कर सकी मैं। बहुत देर कर दी थी सूरमा ने बताने में किसी को अपना हाल, पर समझ गए थे पापा, बड़ी होने लगी है उनकी बेटी, भरोसा टूटने पर संभल ही जाएगी धीरे-धीरे ......
सच में खलनायकी कर गया स्थिर, अब कोई सूरमा किसी को दिल नहीं दे पायेगी, स्थिर हो जाएगी अपने सपनों में , खो भी नहीं पायेगी जूतें के निशान ढूँढने और तारों के बीच अफसाने बनाने मे ...
Like ·  · Promote ·